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बजट की मार से बेजार परिवार अदालतें

 

 

एम.वाई. सिद्दीकी
पूर्व सूचना निदेशक, विधि व न्याय और रेल मंत्रालय,
भारत सरकार

 

 


देश की अदालतों में बढ़ते मुकदमों की संख्या से चिंतित केंद्र सरकार इसे कम करने की कवायद में परिवार न्यायालय की स्थापना के जिस लक्ष्य से लेकर आगे बढ़ी, राज्य सरकारों की उदासीनता और बजट आवंटन की पेचदिगियों में यह उलझकर रह गया। इसके पीछे राज्य सरकारों द्वारा प्रति न्यायालय 10 लाख रुपये खर्च करने की बाध्यता मुख्य कारण बताया जाता है। राज्य सरकारें नहीं चाह रही कि परिवार न्यायालय की स्थापना और संचालन के खर्च में उसका भी हिस्सा हो। यही कारण है कि अंतत: विवश होकर भारत सरकार को ग्राम न्यायालय की स्थापना करने को बाध्य कर दिया है। भारत सरकार ने बजटीय प्रावधान को भी बदल दिया है। वह ग्राम न्यायालय खोलने के लिए केंद्र-राज्य सरकारों को प्रोत्साहित भी कर रही है। केंद्र का सुझाव है कि जिला से लेकर उच्चतम न्यायालय तक में मुकदमों की बढ़ती संख्या सरदर्द बनती जा रही है, इसे कम करने का एकमात्र रास्ता ग्राम न्यायालयों की स्थापना ही है। केंद्र सरकार ग्राम न्यायालयों के माध्यम से परिवार न्यायालय को संचालित करना चाहती है ताकि पारिवारिक मुकदमे गांव में ही सुलझ जाये। इससे ऊपर के न्यायालयों का भार कम होगा और न्याय मिलने की प्रक्रिया भी तेज हो जाएगी। परिवार न्यायालयों की स्थापना परिवार न्यायालय अधिनियम 1984 के तहत किया गया है। इसका उद्देश्य परिवार और वैवाहिक संबंधों से संबंधित मामले तेजी से निपटाने थे। परिवार न्यायालयों में वैवाहिक तल्खों से निजात दिलाने के अलावा विवाह विच्छेद, अदालती अलगाव, दांपत्य संबंधी अधिकार प्रदान करने, विवाह, वैवाहिक स्थिति का निर्धारण, दंपतियों के संपत्ति विवाद को निपटाने के अलावा किसी भी व्यक्ति को कानूनी अधिकार दिलाने और नाबालिगों की हिरासत संबंधित मामले शामिल हैं। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई सिफारिशों के अनुसार देश के हर जिले में एक परिवार न्यायालय अवश्य स्थापित होने चाहिए। यह प्रस्ताव 16 अगस्त 2009 को राज्यों के मुख्यमंत्री, हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और कानून मंत्री की उपस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने एक सेमिनार में रखे थे। इस प्रस्ताव को अमल में लाने के लिए राज्य सरकारों ने केंद्र से परिवार न्यायालयों की स्थापना के लिए अधिकतम धन उपलब्ध कराने की मांग रखी। वर्तमान में देश के 465 जिलों (कुल जिले 592) में परिवार न्यायालय है ही नहीं। अभी स्थिति यह है कि देश में 212 परिवार न्यायालय कार्यरत हैं और अन्य 18 कोर्ट की स्थापना संबंधित अधिसूचना जारी हो चुकी है। केरल ने प्रति न्यायालय 43 लाख रुपये की मांग की है, उत्तर-प्रदेश ने कुल परिचालन व्यय 13.80 करोड़ में से 23 लाख प्रति न्यायालय की मांग की है। इसके अलावा महाराष्टÑ ने प्रति न्यायालय 16.85 करोड़ की मांग वेतन एवं कार्यालय के लिए किया है। छतीसगढ़ ने 40 लाख की मांग की है। त्रिपुरा ने तो बजटीय प्रावधान 90:10 को बदलने की मांग की है। इस प्रावधान के तहत 90 प्रतिशत राशि राज्यों को खर्च करने हं। हाल ही में गोवा में हुई क्षेत्रीय बैठक में बांबे हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 100 प्रतिशत केंद्रीय बजट सहायता की बात कही। परिवार न्यायालय को लेकर चेन्नई में हुई दूसरी क्षेत्रीय बैठक में तमिलनाडु के कानून मंत्री ने मांग की कि संचालित प्रति परिवार न्यायालय के लिए 25 लाख और गैर संचालित के लिए 2.5 करोड़ रुपये केंद्रीय सहायता मिलनी चाहिए। कानून मंत्रालय के अनुसार अब तक गोवा, हिमाचल प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा, दमन और दीव और लक्षद्वीप ने परिवार न्यायालय स्थापना की जरूरत नहीं समझी है। देश में संचालित कुल 212 परिवार न्यायालयों में से आंध्रप्रदेश में 27, असम में 2, बिहार में 30, छतीसगढ़ में 19, दिल्ली में 5, गुजरात में 9, झारखंड़ में 8, कर्नाटक में 10, केरल में 16, मध्यप्रदेश में 15, महाराष्टÑ में 22, मणिपुर में 1, नागालैंड में 2, उड़ीसा में 5, तमिलनाडु में 6, त्रिपुरा में 3, उत्तर-प्रदेश में 15, उत्तराखंड़ में 7 और पश्चिम बंगाल में 2 परिवार न्यायालय कार्यरत हैं। केंद्रीय कानून मंत्रालय के अनुसार 2009 से लेकर अब तक परिवार न्यायालयों में 20,051 मामले निपटाए जा चुके हैं। परिवार न्यायालय द्वारा अब तक निपटाए गये मामलों को देखते हुए भारत सरकार का मानना है कि यदि देश के हर जिले में एक परिवार न्यायालय स्थापित हो जाए तो उच्च और उच्चतम न्यायालय में लगने वाले मुकदमे के ढेर से मुक्ति मिल जाएगी। लंबित मुकदमे न्याय में देरी का कारण बनते हैं, इससे निजात भी मिल जायेगी।

 


अंग्रेजी से अनुवाद- शशिकान्त सुशांत
पत्रकार

 

 

 

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