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उज्जायिनी की शब्द - प्रवाह साहित्य संस्था का क्षणिका विशेषांक

 

 

उज्जायिनी की शब्द - प्रवाह साहित्य संस्था का क्षणिका विशेषांक अपनी बात से शुरुवात करें तो "कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमनें बड़ी साहित्यिक रचनाएँ नहीं लिखी लेकिन छोटी से छोटी रचना भी लिखी है वह भी पूरी ईमानदारी के साथ समाज के हित के उद्देश्य से लिखी है वह महत्त्वपूर्ण है "इस क्षणिका विशेषांक में गुदगुदाने एवम चिंतनीय के बहुत से पहलू स्पष्ट नजर आते है । योगदान का उदाहरण वाकई में वर्तमान के सच को उजागर करता है ।
श्याम अटल - संसार के सबंध /ऋणाअनुबंध है /दिल और दिमाग में /यहाँ बात उतार लें
रोशनी वर्मा - उफ़ ये इंतजार भी/क्या चीज है कि न हो तो /है जिंदगी बेमजा /अगर हो तो एक सजा
डा. सुबोध गॊर -दूरदर्शन देखकर बच्चे ने कहा /पापा ये नेता लोग संसद में /अक्सर टेबल क्यों बजाते है /हमनें कहा बेटा /ये हमारी समस्याओं को /थपकियाँ देकर सुलाते है
शिशिर उपाध्याय - माँ धुरी है /घर के चक्र की /घर रूपी शहद /के छत्ते की /माधुरी है माँ
तरुणा -जिंदगी /दीवार पर ठुकी /एक कील /जिस पर /शायद /कोई तस्वीर टंगनी थी /लेकिन आजकल /मेले कपड़े /टांगे जाते है
अनिल सवैया "अंतर्मुखी "-तन माटी से बना/माटी में मिल जाए /कुछ भी तेरा तो नहीं /तू क्यों इतना चिल्लाए
रमेश मेहता "प्रतिक "- स्वार्थ आए ,मन बदले /आदमी बदले ,रिश्ते बदले
मीरा जैन -जब लूट - खसोट कर ही खाना /तो ढूंढ़ जो राजनीती में ठिकाना /न लगेगी हिंग न लगेगी फिटकरी/फिर जिधर चाहो उधर हाथ आजमाना
मुन व्वर अली "ताज "- तुम जियो /हजारो साल /झूठ इससे बड़ा /नहीं कोई
निरंजना जैन - मुझे तो /हल्दी -चूने का /घनिष्ठ संबंध /शादी के समय /स्पष्ट नजर आता है /जबकि बेटी को हल्दी लगती है /और /बाप को चूना लग जाता है
गड़बड़ नागर -तुम चिर युवती हो /सृजन अर्चकों के लिए लल्लन टॉप हो। …
कमलेश व्यास "कमल "- कहते है /वो घट-घ ट मे व्याप्त है /परंतु अब /घाट और पनघट /कहाँ प्राप्त है
डा. अजय कीर्ति जैन -मन के रेगिस्तान में /प्यार की /एक बूंद को तरसते /हद्य की वेदना को /पलकों की देहरी पर छलकने को आतुरे बूंदे /और /चुप -चुप होंठ /शब्दों की वेशाखियों के बगेर /सब कुछ कहा जाते है
अशोक "आनन "- तुमने पटककर मुझे /पत्थर पर /अच्छा नहीं किया /में आइना हूँ /तुम्हे/चुभता रहूँगा उम्र भर
डा. राजेश रावल "सुशील "- यक़ीनन घट गई है /बेरोजगारी तब से /राजनीति /व्यापार बन गई है /जब से
संजय जोशी 'सजग '-शादी न रही सादी /धन की बरबादी /सब दिखावे के आदि /यह कहती थी दादी
डा. पुष्पा चोरसिया -बेटी /पराया धन / पीहर में /अटका रहे /उसका मन
स्व. श्री महेंद्र श्री वास्तव - जरा/ बताओ तो /किसी /छोटे बच्चे की हंसी से /क्या /और कोई /हो सकती है / मीठी बात
क्षणिका विशेषांक में एक से बढ़ एक क्षणिकाए है । इनके अलावा साहित्यिक हलचल /सुचना बैंक /शब्द सागर-2 आमंत्रण के साथ खुबसूरत आवरण पृष्ठ से सजी धजी साहित्यिक पत्रिका बेजोड़ है सभी साहित्य करों को हार्दिक शुभकामनाए ।

 

 

क्षणिका विशेषांक
मूल्य सहयोग-200 \- संजय वर्मा "दृष्टि मनावर (धार )
विशेष सहयोग -300 \-
प्रकाशन -ए -99 व्ही डी मार्केट
उज्जैन (मप्र )456006

 

 

 

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