www.swargvibha.in






 

 

डायन प्रथा एवं डायन अत्याचार नियंत्रण पर परिचर्चा

 

 

witchcraft

 

 

 

जगरूकता और दबाव एक बड़ा हथियार: पंकज
स्कूल-कालेजों में कार्यक्रम करने की जरूरत: पांडेय
डायन प्रथा की खात्मा को जागरूकता जरूरी: स्वर्णलता

 

 

‘डायन प्रथा एवं डायन अत्याचार नियंत्रण हेतु मीडिया एवं एनजीओ की भूमिका‘ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन ब्लू हेवेन होटल में ग्रामीण समाज कल्याण विकास मंच डालटनगंज की ओर से किया गया।

 

इस परिचर्चा में कई गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि, अधिवक्ता, षिक्षक और मीडियाकर्मियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विषय प्रवेष कराते हुए कार्यक्रम प्रभारी स्वर्णलता रंजन ने कहा कि 21वीं सदी में भी हम डायन प्रथा से अभिषप्त है। सरकार ने इस अत्याचार नियंत्रण हेतु ‘डायन तथा प्रतिषेध अधिनियम 2001‘ बनाया लेकिन वह प्रभावी ढ़ग से लागू नहीं हो सका। नतीजतन डायन बता कर हत्या के मामलों में कोई कमी नहीं आयी। हमारी संस्था ‘ग्रामीण समाज कल्याण विकास मंच ने ठाना है - डायन प्रथा मुक्त झारखण्ड को बनाना है।‘ इसके लिए संस्था ने ग्रामीण स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम प्रारंभ कर दिया है, लेकिन समाज के सभी वर्गो के सहयोग के बिना हम लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। संस्था के सचिव मो0 हषमत रब्बानी ने कहा कि आखिर महिलाओं के साथ ही अत्याचार क्यों होते है? कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा और डायन प्रथा के कारण महिलाओं को प्रताड़ित किया जाना आम बात हो गयी है। षिक्षित समाज की चुप्पी से भी इस प्रथा को मजबूती मिल रही है। आज फिल्म के नामों से भी डायन प्रज्ञा को बढ़ावा मिल रहा है। मर्दों पर बने फिल्म का नाम एक था टाइगर रखा जाता है, जबकि औरतों पर बनी फिल्म का नाम एक थी डायन रखा गया। इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस प्रथा के विरोध में षिकायतें प्राप्त करने और किसी भी सहायता के लिए हमारी संस्था ने हैल्प लाइन प्रारंभ की है। पलामू प्रमंडल का यह प्रथम टाॅल फ्री नंबर है। 18003456525 पर जब चाहंे बात कर सकते है। इसके अलावा मोबाइल नंबर 7870632026 पर भी मिस काॅल कर छोड़ दें- हम उनसे तुरंत संपर्क करेंगे। कार्यक्रम प्रभारी स्वर्णलता रंजन ने सोसल नेटवर्क जय हो पर चर्चा करते हुए कहा कि फिल्म भले ही फ्लाप रही हो, लेकिन उक्त फिल्म के माध्यम से सामाजिक कार्यों को बढ़ावा दिया गया है। उन्होंने उपस्थित लोगों से 10 लोगों को डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम की जानकारी देने की अपील की। उक्त 10 लोग भी दस-दस लोगों को इसकी जानकारी दें। ताकि सामाजिक नेटवर्क फैलते चला जाए। डायन प्रथा को समाप्त करने में यह भी सहायक साबित होगा।

 

विचार गोष्ठी में अधिवक्ता लाजवंत कुमार तिवारी ने कहा कि समाज जब तक कानून के पहलुओं को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक इस प्रकार की किसी भी कुप्रथा से हमें निजात नहीं मिलेगी। कहा कि डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 2001 को और वृहद करते हुए प्रभावी बनाने की जरूरत है। इसमें कठोर का दंड बढ़ाने की जरूरत है। जब कठोर सजा दी जाएगी तो लोग डायन शब्द कहने से भी दूर भागेंगे।

 

सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार मिथिलेष ने कहा कि सामाजिक कुरीतिओं को समाप्त करने के लिए समाज के लोगों को ही आगे आना होगा। पत्रकार सुरेन्द्र सिंह रूबी ने कहा कि जागरूकता अभियान चलाकर इस प्रथा को समाप्त करने में मदद मिलेगी। मीडियाकर्मी आषुतोष ने गैर सरकारी संगठनों ओर मीडिया को समन्वय स्थापित कर काम करने की सलाह दी। सतबरवा के षिक्षक प्रेम नारायण पांडेय ने ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में जागरूकता गोष्ठी करने का सुझाव दिया। पांकी के सामाजिक कार्यकर्ता हरिजी ने कहा कि हमलोगों ने 25 गांवों में वैसे लोगों को चिह्नित करने का काम षुरू किया है जो डायन प्रथा को बढ़ावा देते है या संरक्षण देने का प्रयास करते है। लेस्लीगंज के अनिल कुमार गिरि ने स्पष्ट रूप से कहा कि ग्रामीण सहयोग करने से कतराते है। वरिष्ठ पत्रकार तौहीद रब्बानी ने कहा कि अंधविष्वास को समाप्त करने के लिए हर नागरिक की हिस्सेदारी जरूरी है। विचार गोष्ठी के मुख्य वक्ता बैंक अधिकारी एवं स्तंभकार पंकज कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि जागरूकता और दबाव एक ऐसा हथियार है जिससे किसी भी कुप्रथा पर कुठाराघात आसानी से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत प्रतिषोध और व्यक्तिगत असहमति के कारण किसी भी महिला का डायन घोषित कर दिया जाता है। दबंगों के इरादे जब सफल नहीं होते तो वह किसी भी लाचार-विधवा महिला को डायन घोषित करा कर उसे प्रताड़ित करते है। नसीम अहमद (श्रम्स), पत्रकार ब्रजेष तिवारी, अरूण षुक्ला आदि ने भी हिस्सा लिया।

 

 

 

 

HTML Comment Box is loading comments...