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लोकसप्तक और किताबों से रूबरू

 

loksaptak

 

जनवादी लेखक संघ बाँदा द्वारा आयोजित किसान संवाद गोष्ठी की श्रंखला में दिनांक 25 एवं 26 जून को "लोकसप्तक और किताबों से रूबरू" नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया ।इस आयोजन मे देश के विभिन्न राज्यों से आए जाने माने लेखकों ने शिरकत की । दिनांक 25 जून को शहर मे स्थित "कवि केदार सभागार" में शाम तीन बजे से आठ बजे तक और 26 जून को शहर से साठ कीमी दूर अति बीहड एतिहासिक कालिंजर के किले मे विशाल काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ । लोकसप्तक और किताबों से रूबरू कार्यक्रम का उद्देश्य लोक में बडी तेजी से विलुप्त हो रहे क्रान्तिकारी , जनवादी गीतों , कथाओं , मुहावरों को बचाने के लिए जागरुकता उत्पन्न करना था । साथ ही प्रगतिशील जनवादी कविता का ऐतिहासिक मूल्यांकन करते हुए उसे सप्तक के रूप मे प्रकाशित करना है । इस कार्यक्रम की अध्यक्षता इलाहाबाद से आए वरिष्ठ कथाकार / आलोचक नीलकान्त ने की व संचालन जनवादी लेखक संघ बाँदा के अध्यक्ष उमाशंकर परमार ने किया ।आगन्तुक मेहमानों का का स्वागत डीसीडीएफ अध्यक्ष व माकपा नेता सुधीर सिंह ने किया उन्होने कहा कि जनवादी लेखक संघ बाँदा की संवाद गोष्ठियों ने राष्ट्रीय स्तर पर बडी पहचान बनाई है । सभी आगन्तुकों का स्वागत है हम चाहेंगें कि आप हमेशा यहाँ आते रहें ताकि जनवादी प्रगतिशील गोष्ठियों की परम्परा निरन्तर चलती रहे । आरम्भ में भिलाई से आए जाने माने कवि नासिर अहमद सिकन्दर ने लोकसप्तक का घोषण जारी करते हुए कहा “हम कला का विरोध नही करते हम कला विरोधी नहीं है कलावाद का विरोध करते हैं । जिसकी आस्था लोक के प्रति होगी वह "कला के लिए कला" पर आस्था कैसे रख सकता है ।प्रगतिशील जनवादी कविता में भी कला है लेकिन मूल्यों और सरोकारों की कीमत पर नही है । लोक सप्तक कलावादी और प्रगतिशील कविता में बडी विभाजन रेखा खींचेगा और नये सिरे से नये सवालों को लेकर चर्चा करेगा ।साथ ही आज के दौर में पूँजी के भव्य निवेश द्वारा उत्पन्न साहित्यिक मूल्यहीनता के खिलाफ रचनात्मक आन्दोलन को एक दिशा देगा |” बहस को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली से आये प्रो बली सिंह ने कहा “लोकसप्तक का यह घोषणापत्र कई मायनों में बडा कदम है । इस प्रपत्र में सारी बातें साफ़ कर दी गयीं हैं । कविता को वैचारिकता से जोडना व जनजीवन से जोडने का आग्रह प्रगतिशील आन्दोलन का मूल है ।सबसे बडी बात यह है कि इस घोषणापत्र में "लोक" की संरचना को सटीक ढंग से बता दिया गया है । लोक और लोकधर्मिता , लोक और फोक दोनो में अन्तर करना बेहद जरूरी है जरूरी इसलिए कि लोक को अभी भी लोग फोक समझते हैं । इस घोषणापत्र मे यह कहना कि लोक की संरचना वर्गीय है व लोक का विलोम प्रभू वर्ग है यह समझ ही प्रगतिशीलता है । यदि चालीस के दशक से लेकर 2020 तक की कविता पर "लोकसप्तक " के अंक जारी किए जाएगें जैसा घोषणापत्र में लिखा है तो मै कहूँगा कि यह प्रगतिशील कविता का नया इतिहास लेखन होगा ।“ वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना ने कहा “बाँदा मेरा अपना शहर है यहाँ मेरे अपने लोग हैं पहले केदारबाबू की सक्रियता ने इस शहर को पहचान दी अब यह शहर पिछले कुछ वर्षों से फिर से अपनी साहित्यिक गतिविधियों से चर्चा में आया है । लोकसप्तक की योजना पिछले लोकविमर्श आयोजन में तय की गयी थी लेकिन इसे अन्तिम रूप मार्च महीने में कोलकाता में मानबहादुर लहक सम्मान के दौरान हुई एक बैठक में दिया गया ।यह घोषणापत्र बाँदा में जारी होगा यह भी तय था । आज युवा लेखकों की विशाल पीढी परम्परा को आगे ले जाने के लिए उपस्थित है । इस लोकसप्तक को तैयार करने का उत्तरदायित्व इसी पीढी के हाथ में है और उनके मार्गदर्शन के लिए नीलकान्त जी जैसे अनुभवी वरिष्ठ लेखकों हैं निश्चित तौर पर यह अपने आप में चुनौतीपूर्ण मगर विलक्षण काम होगा ।“ वरिष्ठ आलोचक नीलकांत ने कहा “प्रगतिशील कविता के विरुद्ध सुविधाभोगी वर्ग ने बहुत साजिसें की हैं जैसे किसी उद्योग में पैसा लगाया जाता वैसे ही पैसा खर्च किया गया । एक तरफ सत्ता उनका दमन करती रही तो दूसरी तरफ उन्ही के एजेन्ट पैसा खर्च करके सप्तक और पत्रिकाएँ निकालकर भ्रम फैलाते रहे । फिर भी धारा चलती रही और आज भी चल रही है ।कभी खतम नही हुई लोकसप्तक लोक की बात करता है जब लोक शब्द बोला जाता है तो वह केवल प्रगतिशीलता भर नही है वह मृत हो रही भाषा और रचनाओं को बचाने का आन्दोलन है । आज मुहावरे , कहावतें , लोककथाएँ , क्रान्तिकारी लोकगीत सब नष्ट हो रहे हैं , इन्हे बचाना जरूरी है आज की नयी पढी लिखी पीढी पर यह बडी जिम्मेदारी है । लोकसप्तक इन विलुप्त हो रही चीजों पर भी अपनी बात रखेगा । मेरा सुझाव है कि यहाँ उपस्थित सभी लेखक और कवि अपनी अपनी लोकभाषा पर लोकसंग्रह तैयार करें और लोक में उपस्थित प्रगतिशीलता को रेखांकित करें । लोकसप्तक बडा काम है इसके अपने खतरें हैं लेकिन मुझे आप सब पर विश्वास है इस काम को कर लेगें ।“ दूसरा सत्र किताबों से रूबरू का रहा जिसके अन्तर्गत जनवादी लेखक संघ बाँदा के जिला उपाध्यक्ष जवाहर लाल जलज की किताब "रहूँगा उन्ही शब्दों के साथ" जिला सचिव प्रद्युम्न कुमार सिंह द्वारा संपादित किताब "युग सहचर" व जलेस के वरिष्ठ सदस्य रामौतार साहू की किताब "पाषाण बनकर क्या करेगें" । बाँदा के युवा व्यंग्यकार कृष्णदत्त सिंह का नया व्यंग्य संग्रह होते करते व उमाशंकर सिंह परमार की आलोचना पुस्तक पाठक का रोजनामचा का विमोचन हुआ । विमोचन कर्ता रहे नीलकान्त , बली सिंह , सुधीर सक्सेना , नासिर अहमद सिकन्दर , शम्भु यादव , अजय रंजन , व बुन्देली के वरिष्ठ जनवादी गीतकार गज़लकार महेश कटारे सुगम ।इन चारो किताबों पर छत्तीसगढ एवं लखनऊ के साथियों ने विमर्श किया छत्तीसगढ के युवा कवि कमलेश्वर साहू , कुमेश्वर व युवा दलितकथाकार किशनलाल ने इन किताबों को प्रगतिशील धारा की बेहतरीन कृतियाँ कहा । लखनऊ के युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी , युवा कवि बृजेश नीरज , फतेहपुर के जलेस सचिव प्रेमनन्दन ने भी अपनी बात विस्तार से रखी । २६ मार्च को कालिंजर में कविता पाठ आयोजित हुआ , अध्यक्षता नीलकान्त ने की संचालन वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना ने किया । सुधीर सक्सेना ने "हिटलर की मूँछ , काशी में प्रेम , कविताएं पढीं महेश कटारे सुगम , कालीचरण सिंह , नासिर अहमद सिकंदर जवाहर लाल जलज की गज़लों में लोक और प्रतिरोध की शानदार अभिव्यक्ति हुई । दिल्ली से आए बली सिंह ने नोटबन्दी व किसान आत्महत्याओं पर कविताओं का पाठ किया । शम्भु यादव ने मंडेला , माँ , आदि कविताओं का पाठ किया । दिल्ली से आए अजय रंजन व रायपुर के युवा कवि / कथाकार किशन लाल , भिलाई के कमलेश्वर साहू , रंगकर्मी कुमेश्वर की कविताओं को सुनना आज की उपलब्धि रही । उमाशंकर सिंह परमार , प्रद्युम्न कुमार सिंह , दीनदयाल सोनी , ने भी कविता पाठ किया । नीलकान्त ने पढी गयी गज़लों और कविताओं पर बोलते हुए कहा कि मैने ऐसा सार्थक और जनवादी आयोजन नही देखा न ही इतना प्रभावशाली पाठ कभी सुना ।वरिष्ठ कवियों को इन युवा कवियों से पाठ करने की शैली और भाषा का तेवर सीखना चाहिए । उन्होने कालीचरण सिंह और सुगम की गजलों पर विस्तार से बात की । सुधीर सक्सेना ने घोषणा की कि दुनिया इन दिनों के अगामी अंक में "कालिंजर में कविता" नाम से यहाँ पढी गयी कविताओं को प्रकाशित किया जाएगा , इन कविताओं पर टिप्पणी नीलकान्त जी की रहेगी । इस दोनों में गोष्ठीयों में स्थानीय पाठकों पत्रकारों लेखकों और बुद्धिजीवियों की भारी संख्या उपस्थित रही बाँदा के चन्द्रिका प्रसाद सक्सेना , चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित , रामगोपाल गुप्त , गया प्रसाद यादव , शशिभूषण मिश्र , गोपाल कृष्ण गोयल , नारायन दास गुप्त , कालीचरण सिंह , आदि उपस्थित रहे और अपने अपने विचार अभिव्यक्त किए

 


उमाशंकर सिंह परमार

 

 

 

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