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कवि महेंद्रभटनागर : एक भेंट-वार्ता
— डा॰ विपुल जोधानी

आपकी कविता में समसामयिकता का निर्वाह कहाँ-तक हो पाया है?
समसामयिकता से कोई भी रचनाकार अछूता नहीं रह सकता। हमारे इर्द-गिर्द जो घटित होता है, उसका हमारी चेतना पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। अन्यों की अपेक्षा कवि अधिक संवेदनशील और भावुक होता है। व्यक्ति एवं समाज तथा राष्ट्र एवं विश्व की दशाएँ उसे अधिक तीव्रता से आन्दोलित करती हैं। वस्तुतः समसामयिकता का निर्वाह युग-धर्म है। कविता में युग-बोध की अभिव्यक्ति विचार और भाव के स्तर पर तो होती ही है; वह कलात्मक भी होती है। इसलिए कविता सामाजिकों को अधिक आकर्षित करती है।

आपके प्रारम्भिक रचनाकाल में कविता की जो स्थिति थी; उसे वर्तमान से कहाँ तक जोड़ा जा सकता है?
मेरा रचना-काल सन् 1941 के लगभग अंत से प्रारम्भ होता है। ज़ाहिर है, कविता की जो स्थिति तब थी, वह आज नहीं रह सकती। जीवन और जगत निरन्तर विकासशील हैं। कविता का स्वरूप भी सदा एक-सा नहीं रह सकता। अद्यतन कविता का स्वरूप अधिक गद्यात्मक देखने में आता है। उसमें भाव के स्थान पर विचार तत्त्व अधिक प्रबल है। उसकी कथन-भंगी अधिक तार्किक और मुखर है। लेकिन कलात्मकता के अभाव में वह नीरस और बोझिल हो गयी है। यही कारण है कि पाठकों में कविता के प्रति अब उतनी रुचि नहीं रही।

जीवन और साहित्य के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?
जीवन और साहित्य का संबंध अन्योन्याश्रय है। साहित्य जीवन का प्रतिबिम्ब है। साहित्य-रचना मात्रा मानव-समाज के निमित्त ही होती है। जो साहित्य हमारे हृदय का परिष्कार करता है; जो हमारी दृष्टि को व्यापक और उदार बनता है; वरेण्य है। साहित्य सर्व-देशीय सर्व-कालिक अनुभूतियों और विचारों का वाहक होना चाहिए।

हिन्दी साहित्य की वर्तमान स्थिति पर आपके विचार क्या हैं?
हिन्दी साहित्य की वर्तमान स्थिति संतोषप्रद है। आज विश्व का सर्वोत्तम मौलिक साहित्य भारत में लिखा जा रहा है। पाश्चात्य प्रवृत्तियाँ अब कम ही देखने में आ रही हैं। वर्तमान हिन्दी साहित्य में देशज वातावरण और स्थानीय रंग प्रमुखता से उभरे हैं। साहित्य चाहे आभिजात्य हो; चाहे जनवादी अभिव्यक्ति-कला और भाषा की दृष्टि से स्तरीय होना चाहिए; तभी साहित्य जन-मानस को आन्दोलित कर सकने में क्षम हो सकेगा।

आपके समकालीन साहित्यकारों में आप किससे अधिक प्रभावित हैं? क्यों?
किसी समकालीन साहित्यकार से प्रभावित हूँ; ऐसा तो कुछ नहीं। जहाँ तक विचार- धारा का प्रश्न है; प्रगतिशील चिन्तन मुझे आकर्षित करता है। यह प्रगतिशीलता मार्क्स और गाधी दोनों में दृष्टव्य है। महाकवि तुलसीदास के जीवन-मूल्य भी आज प्रासंगिक हैं। ऐसे अनेक समकालीन साहित्यकार हैं जो व्यावहारिक स्तर पर ऐसे चरित्रों की सृष्टि कर रहे हैं जो हमारी संवेदना को जाग्रत करते हैं। भावना के स्तर पर यह भूमिका कविता निभा रही है। उदारता और सहनशीलता को मैं सर्वोच्च जीवन-मूल्य मानता हूँ। ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ का सपना साकार हो। हमें अपनी ओर से निरन्तर प्रयत्न करने चाहिए।

प्रगतिशील कविता में आप प्रमुख रूप से किसकी प्रगति चाहते हैं?
साहित्य और कला का संबंध मनुष्य से है। ज़ाहिर है, ‘प्रगति’ से आशय मानव-समाज की प्रगति से है। समाज दो वर्गों में स्पष्ट विभाजित है — शोषक और शोषित। प्रत्येक मानवतावादी रचनाकार शोषितों का पक्षधर होता है। प्रगतिशील साहित्य के सरोकार समाज के शोषक वर्ग से सम्बद्ध हैं। उपेक्षित-वंचित, पीड़ित-पददलित मानव-समाज के दुख-दर्द को, उसके संघर्ष और विकास को अपना प्रमुख प्रतिपाद्य बनाना प्रगतिशील लेखक व कवि का धर्म है। प्रगतिशील रचनाकार आर्थिक पक्ष को प्राथमिकता देता है। अर्थ के सम-विभाजन से ही शोषक-वर्ग समाप्त किया जा सकता है। देश की अर्थ-व्यवस्था पर सरकार का कड़ा अंकुश अनिवार्य है। पूँजीपति वर्ग का प्रभाव तभी कम हो सकता है।

डा. जनेश्वर वर्मा ने ‘हिन्दी कविता : मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य में’ आपको मार्क्सवादी घोषित किया है — क्या आप सहमत है?
कथन सत्य होते हुए भी किंचित स्पष्टीकरण की अपेक्षा रखता है। मेरी विचार - धारा और मार्क्सवादी विचारधारा में जो साम्य है, वह आकस्मिक है। इस संदर्भ में मैंने पूर्व में भी लिखा है, जिसे उद्धृत करना युक्तियुक्त होगा। यथा — ‘‘कालेज के अर्थशास्त्र और भूगोल के अध्ययन ने मुझे प्रकृति के क्षेत्र से मानवी धरातल पर ला खड़ा किया। उस समय द्वितीय महायुद्ध और भारतीय स्वाधीनता संग्राम अपनी चरम सीमा पर थे; जिनका भावात्मक प्रभाव मेरे मन पर बड़ा गहरा पड़ा। यह असम्भव था कि उसकी अभिव्यक्ति मेरे काव्य में न होती। अभिव्यक्ति मात्र ही नहीं वरन् इन घटनाओें ने मेरे कवि-व्यक्तित्व को ही एकदम नयी दिशा में मोड़ दिया। राष्ट्रीय-उद्बोधन की ओर प्रवृत्त हुआ। गांधी जी राष्ट्रीय आन्दोलनों का नेतृत्व कर रहे थे; एतदर्थ मैं उनसे प्रभावित था और आज भी उनकी नैतिकता का क़ायल हूँ। पर, राजनीति विषयक मेरा ज्ञान कुछ न था। राजनीति से मेरा भावात्मक संबंध ही कहा जा सकता है। राजनीति जब साधारण जनता के जीवन को प्रभावित करने लगती है, तब उससे विलग भी नहीं रहा जा सकता। अतः राजनीतिक चेतना से मैं अपने को नहीं बचा सका। मुझ जैसे निम्न-मध्यम वर्गीय व्यक्ति का उससे बचना असम्भव भी था। इसी समय वामपक्षी विचार-धारा से भी मेरा परिचय हुआ। परिवार की विकट आर्थिक परिस्थितियों के बीच जब मैं ऐसे विचारों के सम्पर्क में आया तो मुझे उनमें अपने मन की बात मिल गयी ! जो मैं सोचता था, वह लोग पहले ही सोच चुके थे — उन विचारों को ग्रंथ-बद्ध कर चुके थे। एतदर्थ यह वैचारिक साम्य पा कर मुझे बड़ा संतोष मिला। सन् 1942 का देश-व्यापी आन्दोलन, बंगाल का अकाल, आज़ाद हिन्द फौज़ का अभियान आदि ऐसी घटनाएँ हैं जिनका जन-साधरण के मन पर प्रभाव पड़ना अनिवार्य था। इस प्रभाव का राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं है। कोई भी भावुक व्यक्ति, जिसके हृदय में देश तथा मानवता के प्रति प्रेम है, अपने को इन घटनाओं से अछूता नहीं रख सकता। मैं प्रभावित था; अतः मैंने इन विषयों पर लिखा।’’

आपके जीवन और आपकी रचनाओं में किस सीमा तक साम्य परिलक्षित होता है?
मेरा जन्म निम्न-मध्य-वर्गीय परिवार में हुआ। पिता जी अल्प-वेतन-भोगी अध्यापक थे। परिवार में माता-पिता, चार भाई और दो बहन। बड़ी ग़रीबी में बचपन बीता। बी. ए. (1945) करने के बाद, मुझे भी अध्यापक की नौकरी करनी पड़ी। मेरा भी अधिकांश सेवा-काल अल्प वेतन का रहा। एक अत्यध्कि निर्धन परिवार की कन्या से विवाह (1952) हुआ। तीन पुत्र हैं। एक डाक्टर, दूसरा बैंक-ब्रांच-मैनेजर, तीसरा पार्श्व-गायक। ग़रीबी क्या होती है; इसका बड़ कटु अनुभव हुआ। मेरे काव्य में जो आक्रोश और विद्रोह-भाव है; उसका कारण मेरा व्यक्तिगत जीवन है। उच्चतम शिक्षा प्राप्त होने से (पिता जी इतिहास विषय में एम. ए. थे) हमारे परिवार को दलित तो नहीं कहा जा सकता; किन्तु आर्थिक विपन्नता सदा बनी रही। स्वातंत्र्योत्तर भारत में सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतनमान कुछ सुधरे। कालेज-प्रोफ़ेसर पद से 1 जुलाई 1984 को अल्प-पेंशन पर, 58 वर्ष की उम्र पर, सेवानिवृत्त हुआ। इधर, 84 वर्ष की उम्र में पेंशन-पुनरीक्षणों के फलस्वरूप पर्याप्त पेंशन-वृद्धि ज़रूर हुई। कहने का आशय यही है कि मेरे काव्य का प्रगतिवादी-जनवादी स्वर मेरी स्वयं की ज़िन्दगी से मुखर हुआ है।

आपका काव्य-संग्रह ‘आहत युग’ सन् 1997 में प्रकाशित हुआ — आप किसे आहत व्यंजित करना चाहते हैं?
‘आहत युग’ में सन् 1987 से 1997 के बीच लिखी कविताएँ समाविष्ट हैं। आलोचकों ने इसे जीवन्त और सशक्त युग-बोध का काव्य बताया है। इस संग्रह की अनेक कविताएँ तत्कालीन भ्रष्ट राजनीतिक माहौल को उजागर करती हैं। आलोचकों के अनुसार ‘आहत युग’ की कविताएँ जीवन-सत्यों से रू-ब-रू होने के क्रम में लिखी गयी हैं। अतः स्पष्ट है, इस कृति में एक युग की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों का आकलन है। युग के आहत होने से आशय उस युग की आम जनता के आहत होने से है।

‘अनुभूत-क्षण’ में जो निराशा देखने को मिलती है; वह क्या उम्र से उपजी हुई निराशा है? या व्यक्तिगत अनुभव का निष्कर्ष है?
‘अनुभूत-क्षण’ में अभिव्यंजित वेदना और निराशा जीवन का यथार्थ है। इसमें सब्जेक्टीविटी ज़रूर है; किन्तु यह यथार्थ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से सम्पृक्त है। ऐसे अनुभवों का संबंध उम्र से नहीं होता। हाँ, जीवन-संध्या में व्यक्ति वर्तमान के साथ अतीत पर भी नज़र डालता है। मैंने सहज भाव से अपनी निराशा-हताशा को अभिव्यंजित किया है, क्योंकि वह एक सचाई है। मैं जब-जब टूटा हूँ, सताया गया हूँ, विश्वास-खंडित हुआ हूँ तो मन-ही-मन रोया हूँ। मेरी कविता में जो दर्द है वह मेरे जीवन-अनुभव का हिस्सा है। बनावटी ज़िन्दगी मैंने कभी नहीं जी। मन को प्रबोध दिया; किन्तु हृदय को रुग्ण नहीं होने दिया। सामाजिकता से मेरा नाता कभी टूटा नहीं। आज इस उम्र में संन्यास-भाव जागता ज़रूर है; किन्तु वह मुझ पर अभी हावी नहीं हुआ है।

आपकी कविता में आस्था या आस्तिकता के दर्शन होते हैंऋ तो यह आस्था क्या स्वयं-उत्पन्न है अथवा इसका प्रेरणा-स्रोत कोई और है?
आस्था-आशा-विश्वास के स्वर मेरे काव्य में प्रमुखता से इसलिए ध्वनित हैं क्योंकि मैं इंसानियत पर भरोसा करता हूँ। मेरा सोच सकारात्मक है। मनुष्य में पशुता एक दिन अवश्य समाप्त होगी। माना कि वर्तमान यथार्थ हमें जब-तब हतोत्साहित करता है। मुझमें यह भावना स्वयं-उत्पन्न है; आरोपित नहीं।

वर्तमान समय में, समाज के लिए, धर्म की भूमिका क्या होनी चाहिए?
धर्म नैतिक मूल्यों से सम्बद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म का निर्वाह करना ही चाहिए। सामाजिक स्वास्थ्य के लिए यह अनिवार्य है। अन्यथा मनुष्यों की दुनिया और पशुओं की दुनिया में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा। धर्म को ईश्वर से जोड़ने में कोई हानि नहीं है। क्योंकि जब-तक मृत्यु का रहस्य वैज्ञानिक खोज नहीं लेते; ईश्वर का अस्तित्व बना रहेगा। लेकिन धर्म जब सम्प्रदायों और बाह्य आडम्बरों में फँस जाता है तब दूषित हो जाता है। बौद्धिक चेतना और वैज्ञानिक प्रगति के बावज़ूद बाह्य आडम्बरों का त्याग मानव-समुदाय नहीं कर पा रहा है। साम्प्रदायिक वैमनस्य भी सर्वत्र बढ़ रहा है। आज सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानवीय मूल्य ‘सर्व-धर्म-समभाव’ (सेक्यूलरिज़्म) है; जिसे अपना कर विश्व सुख और शांन्ति से जी सकेगा।

वर्तमान राजनीति के संदर्भ में आपके विचार क्या हैं?
वर्तमान में सबसे भ्रष्ट यदि कोई संस्था है तो वह राजनीति है। माना राज-संचालन के लिए राजनीति अनिवार्य है। अब राजा-महाराजाओं का समय नहीं रहा। आज जनता स्वयं अपने भाग्य की निर्माता है। लेकिन राजनीति करने वाले समृद्ध नेता और उनके द्वारा स्थापित राजनीतिक दल जनता के प्रति खुलकर खिलवाड़ कर रहे हैं। जनता जाति, धर्म, भाषा के नाम पर बरगलायी जा रही है। धन और पद के प्रलोभनों से शिक्षित जन भी आसानी से ख़रीद लिए जाते हैं। जो अधिकारी और पूँजीपति सत्ताधरियों के काले कारनामों में सहयोग करते हैं; उन्हें राज की ओर से प्रश्रय मिलता है। मात्र न्यायपालिका से कुछ उम्मीद शेष है; लेकिन असाधरण विलम्ब से न्याय मिलने के कारण सब निरर्थक सिद्ध होता है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रति आपके विचार?
भारतीय संस्कृति और सभ्यता का मैं क़ायल हूँ। मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं भारत में जन्मा। गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और विवेकानंद की करुणा, अहिंसा और प्रगतिशीलता ने मेरे हृदय और मस्तिष्क की रचना की है। ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ मेरा अभिप्रेत है। धर्म-निरपेक्षता(सेक्यूलरिज़्म) को सबसे बड़ा मानवीय मूल्य मानता हूँ। पीड़ित मानवता की सेवा करना अपना धर्म समझता हूँ। एक बेहतर दुनिया देखने की मेरी हार्दिक लालसा है। यह स्वप्न भले ही मेरे जीवन-काल में पूर्ण न हो; किन्तु यह विश्वास मेरी अन्तिम श्वास तक जीवन्त रहेगा।

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डा॰ विपुल आर॰ जोधानी,
‘रिद्धि’, बी/16 सुभाषनगर, खलीलपुर रोड, जोषीपुरा,
जूनागढ़ — 362 002 (सौराष्ट्र-गुजरात)

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