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प्राचीन गौरव और ऐतिहासिक विरासत से समृद्ध होगा नालंदा विश्वविद्यालय

 

 

 

विदेश मंत्रालय ने समझा नालंदा विश्वविद्यालय का महत्व

एम.वाई. सिद्दीकी
पूर्व सूचना निदेशक, विधि व न्याय और रेल मंत्रालय, भारत सरकार

 

 

 

लंबे समय तक अफसरशाही के चंगुल में फंसा नालंदा विश्वविद्यालय का प्रस्तावित अंतरराष्टÑीय संबंध बौद्धिक स्कूल अब नई दिल्ली की जगह नालंदा में ही खुलेगा, इससे संबंधित नीतिगत निर्णय को विदेश मंत्रालय ने संसद की स्थाई समिति की सिफारिशों के आधार पर बदल दिया है। कुछ दिनों पूर्व विदेश मंत्रालय के अधिकारी कथित विदेशी छात्रों की सुविधा के नाम पर नालंदा विश्वविद्यालय का एक महत्वपूर्ण निकाय नई दिल्ली में ही स्थापित करने के लिए कानूनी और व्यवस्थागत पचड़े डाल दिए थे। इसे लेकर देश के बुद्धिजीवियों समेत कई संगठनों ने चिंता जाहिर की थी। अंतत: सरकार ने इस मामले को संसद की स्थाई समिति को सौंपते हुए इसका निदान करने का कार्य सौंप दिया था। विदेश मंत्रालय से संबंधित संसद की स्थाई समिति ने नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर, राजगीर में अंतरराष्टÑीय संबंध स्कूल को खोलने की सिफारिश करके भारतीय नौकरशाही की कुटिल चालों पर विराम लगा दिया है। अब नालंदा विश्वविद्यालय के सभी सातों स्कूल नालंदा यूनिवर्सिटी कैंपस, राजगीर में ही खोले जाएंगे। अब दिल्ली में संबंधित अंतरराष्टÑीय बौद्धिक स्कूल का विस्तारित केंद्र ही खुलेगा जहां पर विदेशाी छात्रों, शोधार्थियों, विदेशी व्याख्याताओं आदि के लिए सुविधा केंद्र खोला जाएगा।
राजगीर (बिहार) में स्थापित हो रहे प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की तर्ज पर ही नए विश्वविद्यालय की रूपरेखा तैयार करनी है। यह लगभग तय हो चुका है, क्योंकि इससे पहले विदेश मंत्रालय के अफसरों ने अंतर्राष्टÑीय अध्ययन केंद्र को राजगीर में न स्थापित कर नई दिल्ली से संचालित करने की चाल चली। नालंदा का प्राचीन गौरव उसकी बौद्धिक विरासत को बयां करता है। बताया जाता है कि विदेश मंत्रालय के कुछ नीति-निर्माताओं ने पिछले साल नालंदा विश्वविद्यालय को खंडों-उपखंडों में संचालित करने की कुटिल चाल चली थी जिसमें उनका निजी हित समाहित था। लेकिन संसद की स्थाई समिति ने नालंदा के गौरव को पुन: राजगीर में प्रतिष्ठापित कर दिया। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना संसदीय विधान के तहत 2010 में भारत सरकार द्वारा की गई है। राजगीर में बनने वाले इस अध्ययन केंद्र को उसकी महत्ता और गौरव को अक्षुण्ण रखते हुए उसे वैश्विक स्तर का सांस्कृतिक और सभ्यता का अध्ययन केंद्र बनाया था, जिसमें भारत की प्राचीन बौद्धिक विरासत का प्रतिबिंब झलके और दुनिया भर के शिक्षार्थी भारतीय सभ्यता-संस्कृति को पढ़ सके कि कैसे प्राचीन भारत, बौद्विक सभ्यता का केंद्र था। विदेश मंत्रालय के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय को वैश्विक स्तर का अध्ययन केंद्र बनाने के लिए सरकार कृतसंकल्पित है। यह केंद्र प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से लेकर राजगीर तक के क्षेत्र में विकसित होगा। विश्वविद्यालय की बौद्धिक टीम प्राचीन केंद्र को सुरक्षित रखते हुए नए केंद्र को संचालन प्रक्रिया में लाने को प्रयासरत है। नए अध्ययन केंद्र के विस्तार और विकास के मद्देनजर नियमों की अवहेलना न हो, पारदर्शिता बनी रहे इसका विशेष ध्यान रखा गया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार संशोधित डीपीआर में नालंदा विश्वविद्यालय कैंपस निर्माण पर 21.54 करोड़ रुपये खर्च करने है। इसके लिए 2010-11 से 2020-21 तक समय निर्धारित किया गया है। इस कार्य के लिए इडीसीआईएल कंसल्टेंट एजेंसी है। बहराल विश्वविद्यालय को मूलभूत संरचना तैयार करने से पहले उसकी चारदीवारी का निर्माण सबसे प्रमुखता से किया जा रहा है। इसमें 9-10 माह की देरी हो चुकी है। अब यह 2013 के अंत तक पूरा हो पाएगा। विश्वविद्यालय का वास्तुशिल्प ग्लोबल डिजाइन के तौर पर विकसित किया जाएगा। इसके लिये राष्टÑीय और अंतर्राष्टÑीय स्तर के शिल्पकारों को आमंत्रित किया जा रहा है ताकि नालंदा विश्वविद्यालय का भवन उसकी प्राचीन परंपरागत विरासत को संजोए रखते हुए वैश्विक स्तर का बन सके। इस दिशा में काम तेजी से हो रहा है। शिल्पकारों का चयन और उनके द्वारा सुझाये जा रहे भवन निर्माण संबंधी सिफारिशों का संकलन हो रहा है। इसके उपरांत निर्माण कार्य का निरीक्षण, निविदा आमंत्रण, कंपनी का कार्य भी चल रहा है। नालंदा विश्वविद्यालय की गरिमा, ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक महत्व और सभ्यता केन्द्र की महत्ता को देखते हुए इसके निर्माण में हो रही देरी देश के बौद्धिक जगत को व्यथित कर रहा है। जिस तरह इसकी मूलभूत संरचना को खड़ा करने में देरी हो रही है वह देश की वैश्विक प्रतिष्ठा पर कुठाराघात भी है। विदेश मंत्रालय के नीति-निर्माताओं द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय के निर्माण पर जिस तरह संशय पैदा किया गया, उससे इस यूनिवर्सिटी की गरिमा को चोट पहुंची है। मंत्रालय ने नालंदा विश्वविद्यालय के निर्माण से लेकर उसमें शैक्षणिक सत्र शुरू करने में जानबूझकर देरी की। इस महत्वकांक्षी योजना को खटाई में डालने के लिए न केवल विदेश मंत्रालय बल्कि नालंदा मेंटर ग्रुप और बिहार सरकार के साथ योजना आयोग कम जिम्मेदार नहीं है।

 


अंग्रेजी से अनुवाद- शशिकान्त सुशांत, पत्रकार

 

 

 

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