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स्मृतिशेष-रामनरेश यादव

 

 

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By....घनश्याम भारतीय

 

 


‘ओढ़ कर मिट्टी की चादर बेनिशां हो जाएंगे, एक दिन आएगा हम भी दास्तां हो जाएंगे’ अपने जमाने के मशहूर शायर मरहूम इरफान जलालपुरी की यह पंक्तियां इस बात की प्रमाण है कि जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया है उसे एक न एक दिन मृत्यु शैय्या पर शयन करना ही होगा। प्रकृति के नियमों के आगे आखिर किसका बस चला है। गरीबों दलितों-पिछड़ों व किसानों के मसीहा के रूप में जाने गए रामनरेश यादव भी प्रकृति के उन्हीं नियमों के आगे नतमस्तक होकर जिंदगी की जंग हार गए। लखनऊ से चलकर यह खबर जब गांव तक आई तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि एक मसीहा चुपके से चला गया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और मध्य प्रदेश के राज्यपाल रहे रामनरेश यादव के अवसान की खबर मिलते ही छात्र जीवन के वह दिन स्मृति पटल पर किसी चलचित्र की भांति उभर आए जब 1994 में पहली बार उनसे मुलाकात का अवसर मिला था और जी भर के बातें हुई थी। अवसर था गांव में एक कार्यक्रम का और वे समय से पहले आ गए थे। बाग में बिछी चारपाई पर अपने साथ बिठाकर पहले मेरे बारे जानकारी ली फिर अपने बारे में बहुत कुछ बताया था। तब मेरे पत्रकारिता के शुरुआती दिन थे। निःसंकोच कहा जा सकता है कि उनके अंदर मदद और दोस्ती का एक जज्बा था। जहाँ वे बैठ जाते थे वहीं महफिल सज जाती थी और जब चलते थे तो कारवां साथ होता था। यद्यपि वे आजमगढ़ के निवासी थे परन्तु मेरे अम्बेडकरनगर जिले से उनके अटूट सम्बन्ध थे।
वकालत पेशे से सियासत के शिखर तक पहुंचे रामनरेश यादव डॉ लोहिया की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे। साथ ही राजनारायण के साथी भी थे। चै.चरण सिंह की जनता पार्टी की सरकार के आने पर 1977 में उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बनाये गए रामनरेश यादव बाद में कांग्रेस में शामिल हुए तो जीवन पर्यंत उसी में रहे और राज्यपाल तक का सफर तय किया। उनका जन्म एक जुलाई 1928 ई. को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अम्बारी के निकट आंधीपुर गांव में एक साधारण किसान परिवार में उस समय हुआ था जब देश अंग्रेजों की गुलामी के गहन गहवर से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था। हालांकि उनका बचपन खेत-खलिहानों से होकर गुजरा था इसलिए वे किसानों की पीड़ा को अच्छी तरह समझते रहे। उनकी माँ भागवन्ती देवी धार्मिक प्रवृत्ति की साधारण गृहिणी थीं और पिता गया प्रसाद यादव शिक्षक होते हुए महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ॰ राममनोहर लोहिया के अनुयायी थे। साथ ही सादगी और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति भी थे।
राम नरेश यादव को देशभक्ति, ईमानदारी और सादगी की शिक्षा पिता से विरासत में मिली। जिसे वे आजीवन ढोते रहे। स्वदेशी एवं स्वावलंबन उनके जीवन का आदर्श रहा। गांव के विद्यालय से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद हाईस्कूल की शिक्षा आजमगढ़ के मशहूर वेस्ली स्कूल से और इन्टरमीडिएट की शिक्षा डी.ए.वी. कालेज वाराणसी से लेने के बाद बी.ए., एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्राप्त की। ततसमय प्रसिद्ध समाजवादी चिन्तक आचार्य नरेन्द्र देव काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति थे। विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय के उपदेश तथा पूर्व राष्ट्रपति एवं तत्कालीन प्रोफेसर डॉ॰ राधाकृष्णन के भारतीय दर्शन पर व्याख्यान की गहरी छाप उनके विद्यार्थी जीवन में पड़ी। जिसका असर जीवन भर दिखता रहा। इसी बीच उनका विवाह सन् 1949 में अम्बेडकरनगर जनपद की जलालपुर तहसील के मालीपुर के निकट करमिसिर पुर गांव में राजाराम यादव की पुत्री अनारी ऊर्फ शांति देवी के साथ हो गया। जिनसे तीन पुत्र और पांच पुत्रियों का जन्म हुआ।
स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात रामनरेश यादव वाराणसी में चिन्तामणि एंग्लो बंगाली इन्टरमीडिएट कालेज में प्रवक्ता के पद पर तीन वर्ष और फिर पट्टी नरेन्द्रपुर इंटर कालेज जौनपुर में कुछ समय तक प्रवक्ता रहे। इसी बीच कानून की पढ़ाई पूरी हुई तो सन् 1953 में उन्होंने शिक्षण कार्य छोड़कर आजमगढ़ में वकालत प्रारम्भ कर दी। परिणाम यह हुआ कि अपनी कर्मठता तथा ईमानदारी के बल पर अपने पेशे तथा आम जनता में उन्होंने अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। श्री यादव छात्र जीवन से समाजवादी आन्दोलन में शामिल होकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत कर दी थी। आजमगढ़ जिले के गांधी कहे गये विश्राम राय का उन्हें भरपूर सानिध्य भी मिलता रहा। श्री यादव ने महात्मा गांधी और डाक्टर रामनोहर लोहिया के विचारों को अपने जीवन में उतारा और संघर्ष जारी रखा। विशेष रूप से जाति तोड़ो, विशेष अवसर के सिद्धान्त, बढ़े नहर रेट, किसानों की लगान माफी, समान शिक्षा, आमदनी एवं खर्चा की सीमा बांधने, जमीन जोतने वालों को वास्तविक रूप से उनका अधिकार दिलाने के साथ अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन को लेकर वे अनेकों बार गिरफ्तार भी किए गए। फिर भी उनका आंदोलन थमा नही। आपातकाल के दौरान मीसा और डी.आई. आर के तहत जून 1975 से फरवरी 1977 तक आजमगढ़ जेल और केन्द्रीय कारागार नैनी इलाहाबाद में यातनाएं सही।
इसी बीच इंदिरा विरोधी लहर में कांग्रेस की पराजय के साथ सत्ता पर काबिज हुई किसान नेता चैधरी चरण सिंह की जनता पार्टी की ओर से रामनरेश यादव को 23 जून 1977 को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चुना गया। 15 फरवरी 1979 तक वे इस पद पर बने रहे। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने आर्थिक, शैक्षणिक तथा सामाजिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के उत्थान से जुड़े कार्यों पर सर्वाधिक ध्यान दिया। इसी के साथ गांवों के विकास के लिये समर्पित भी रहे। श्री यादव सन् 1988 में संसद के उच्च सदन राज्यसभा के सदस्य बने। इसी बीच अचानक 12 अप्रैल 1989 को राज्यसभा के अन्दर डिप्टी लीडरशिप, पार्टी के महामंत्री एवं अन्य पदों से त्यागपत्र देकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समक्ष कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। फिर आजीवन कांग्रेसी ही रहे।
अपने राजनैतिक जीवन में मानव संसाधन विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति के पहले अध्यक्ष के रूप में रामनरेश यादव ने स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति के चहुंमुखी विकास को दिशा देने संबंधी रिपोर्ट सदन में पेश की। यही नही केन्द्रीय जन संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत गठित हिन्दी भाषा समिति के सदस्य के रूप में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। वित्त मंत्रालय की महत्वपूर्ण नारकोटिक्स समिति के सदस्य के रूप में सीमावर्ती राज्यों में नशीले पदार्थों की खेती की रोकथाम की पहल की। प्रतिभूति घोटाले की जांच के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति के सदस्य के रूप में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को भुलाया नही जा सकता। पब्लिक एकाउंट कमेटी (पी.ए.सी.), संसदीय सलाहकार समिति (गृह विभाग), रेलवे परामर्शदात्री समिति और दूरभाष सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। कुछ समय तक कृषि की स्थाई संसदीय समिति के सदस्य तथा इंडियन कौनसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च की जनरल बाडी तथा गवर्निंग बाडी के सदस्य भी रहे। लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने में उनके योगदान को भी भुलाया नहीँ जा सकता।
राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में विभिन्न संगठनों तथा संस्थाओं से संबद्ध रहे रामनरेश यादव राज्यसभा सदस्य तथा संसदीय दल के उपनेता भी रहे। साथ ही अखिल भारतीय राजीव ग्राम्य विकास मंच, अखिल भारतीय खादी ग्रामोद्योग कमीशन कर्मचारी यूनियन और कोयला मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ग्रामीणों और मजदूर तबके के कल्याण के लिये लम्बे समय तक संघर्षरत रहे। बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में एक्सिक्यूटिव कॉसिंल के सदस्य के साथ जनता इंटर कालेज अम्बारी आजमगढ़ (उ.प्र.) के प्रबंधक कई शिक्षण संस्थाओं के संरक्षक होते हुए गांधी गुरूकुल इन्टर कालेज भंवरनाथ, आजमगढ़ के प्रबंध समिति के अध्यक्ष भी रहे। राजनैतिक पारी पर यदि नजर डालें तो रामनरेश यादव ने सन् 1977 में आजमगढ़ (उ.प्र.) से छठी लोकसभा का प्रतिनिधित्व भी किया। 1977 से 1979 तक निधौली कलां (एटा) से 1985 से 1988 तक शिकोहाबाद (फिरोजाबाद) से विधायक रहे श्री यादव 1988 से 1994 तक (लगभग तीन माह छोड़कर) उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य रहे। 1996 से 2007 तक फूलपुर (आजमगढ़) से विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 8 सितम्बर 2011 को मध्यप्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ ली। जिस पद पर 7 सितम्बर 2016 तक बने रहे। 22 नवम्बर 2016 को इस महापुरूष के अवसान में उनके चाहने वालों को दुखी कर दिया। ऐसा दुख जिसकी भरपायी फिलहाल नहीं हो सकती।

 

 

 

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