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Excerpts from an interview with Dr. Sarojini Sahoo by Dr. Meena Soni

 

 

Excerpts from an interview with me by Dr. Meena Soni, published in Volume 10, Issue: 31, PUSH, VIKRAM SAMVAT 2069 of quarterly Hindi magazine SURSARI:

 

 

डॉ. मीना सोनी: आप के चर्चित उपन्यास 'गंभीरी घर' बिभिन्न भाषायों में अनुदित हुआ है. हिंदी में 'बन्द कमरा' शीर्षक से राजपाल एंड सोंस ने प्रकाशित किया है. अंग्रेजी में 'द डार्क एबोड' शीर्षक से मलयालम में 'इरुंडा कुदरमा' शीर्षक से तथा बंगलादेश से बंगला में 'मिथ्या गेरोस्थल' नाम से प्रकाशित हो कर देश -विदेश में अपर ख्याति अर्जित किया है. पर जब ओडिया में उसका प्रथम प्रकाशन हुआ उसे 'अश्लील' करार दिया गया. क्या आप समझते हैं ओडिया पाठकों में कुछ कमियां
हैं जो उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंचा पाता है?

 

डॉ.सरोजिनी साहू: ऐसा नहीं की ओडिया पाठकों ने उसे नकारा है. आज भी 'गंभीरी घर' उपन्यास 'बेस्ट सेलर' माना जाता है. ओडिया साहित्य से परिचित ऐसा कोई भी व्यक्ति न होगा जिसने मेरा वह उपन्यास न पढ़ा हो. असल में उपन्यास में सेक्स को गौरवान्वित कभी नहीं किया गया है. यह वस्तुतः एक सेक्स- विरोधी उपन्यास है, जिसमें सेक्स से ऊपर उठकर प्रेम को पहचानने की बात कही गयी है. उपन्यास का दुसरा केंद्र विन्दु है आतंकवाद. सूक्ष्म-स्तर ( माइक्रो लेवल) से ले कर स्थूल रूप (माक्रो लेवल) में कैसे आतंकवाद मानव को एक असहाय खिलौना बना देता है, उसका वर्णन है. इस सारी बातों को अनदेखा कर जिन लोगों ने मेरे उपन्यास में अश्लीलता ढूँडते हैं, उन्हें क्या कह सकती हूँ?

 

डॉ. मीना सोनी:' गंभीरी घर ' ( हिंदी में 'बन्द कमरा') उपन्यास दरअसल एक पाकिस्तानी मुस्लिम चित्रकार और भारतीय गृहिणी महिला के बीच इन्टरनेट के जरिये पनपा प्यार की कहानी है जिसे प्रमुख हिन्दू वादी संगठनों ने एतराज भी जताया है. इस प्रसंग पर आपका क्या कहना है?
डॉ.सरोजिनी साहू: मौल-वाद हमारी सोच को इतना घटिया बना देता है कि हम किसी भी सुन्दर चीज को अपने सांप्रदायिक-स्वार्थ से ऊपर उठकर देख नहीं पाते. जब 'गंभीरी घर' का बंगला अनुवाद बंगलादेश में लोकप्रिय होने लगा तब ओडिशा के अध्यात्मिक गुरु बनने का ढोंग रचाने वाले एक प्रमुख साहित्यकार ने मुझसे प्रश्न किया था , क्या अगर नायक हिन्दू और नायिका मुस्लमान होती तो क्या यह उपन्यास बंगलादेश में इतना लोकप्रिय होता? अब इनसे कौन
बताये कि उपन्यास लिखते समय यह प्रश्न कदापि मेरे मन में भी नहीं आया था कि नायक नायिका के धर्म क्या होना चाहिए. दो देशों के पनपते कटुता के बीच भी प्रेम का बीज उग सकता है, यही था प्रमुख थीम जो आगे चलकर राष्ट्र वनाम व्यक्ति के प्रश्न पर उलझ गया.

 

 

 

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