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कालजयी महामानव श्री वसंत राशिनकर

 

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अनंत में विलिन होकर भी दिलों में राज करने का हुनर जिनको आता है वे कभी मरते नहीं है । उनके कार्यों , उनकी बातों को सदियाँ बीत जाने के बाद भी उनके चाहने वाले याद करते रहते है । और महाप्रयाण के बाद भी ऐसे महामानव कालजयी बन जाते है। म. प्र. की व्यवसायिक राजधानी के नाम से पहचाने जाने वाले शहर इंदौर के राजेन्द्र नगर की पहचान साहित्य और कला जगत में है तो वह श्री वसंत राशिनकर और उनके द्वारा स्थापित आपले वाचनालय के नाम से है।

12 जनवरी 1930 को उज्जैन में जन्में और जीवन भर एक शिक्षक के रूप में प्रेरणा पुंज रहे मराठी कविता, कला, संस्कृति, गायन , वादन, मूर्ति कला के पर्याय श्री वसंत राशिनकर जी 7 जनवरी 2014 को महाप्रयाण कर गये, उन्होने शरीर का त्याग किया लेकिन वे अमर है अपने निवास स्थान पर अपने हाथों से तराशी हुई शिरडी सांई और गजानन महाराज की भव्य प्रतिमाओं के साथ .... अपनी कविताओं के साथ ..... उनकी अमरता के प्रतिक है उनके सुपुत्र सुप्रसिद्ध चित्रकार और कवि संदीप राशिनकर जो पिता के कला और साहित्य प्रेम का पर्याय बनकर देश – दुनिया में छाए हुए है, और अपनी अलग पहचान चुके है।

अपने कालजयी कार्यों से सदैव स्मरणीय रहने वाले श्री वसंत राशिनकर जी को विनम्र श्रद्धांजलि.....।

 

 

संदीप सृजन

 

 

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