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डाँ शोभा श्रीवास्तव

 

 

अपनों की बेपरवाही पे होता है क्यों उदास,
जाहिर सी बात है चिराग तले अँधेरा होता है।
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अच्छा है धूप में चलने की आदत डाल लो,
बार - बार छाँव की इंतज़ारी से बच जाअोगे।
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रोज़ - रो़ज भीड़ से गुजरती रही हूँ मैं,
उम्मीद जिसकी थी वही मिला नहीं मुझे।
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यूं ऎतबार की शमां को बुझा देते हैं,
लोग पानी में जैसे आग लगा देते हैं।
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वफा करना मगर इतना हो कि काबू में दिल रहे,
जहाँ तेरी जान बसती है, न हो वो क़त्लगाह तेरा।
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डाँ शोभा श्रीवास्तव

 

 

 

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