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निलेश शेवगांवकर "नूर"

 

 

त्रिवेणी

 

 

1) हर राह यूँ तो जाती थी तुम्हारे दर तक,
और छोड़ भी आती थी मुझे कूचे तक तेरे
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हाथ की लकीरें राहों से रजामंद ना थी बस!
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2) वो अब भी सितम पे सितम ढाते है,
हम भी मजबूरी में हर ग़म उठाते है…
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खलनें लगा है अपनी आहों का बाँझपन ....
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3) दूर से बस देख पाया, समझ ना पाया,
लर्जिश थी लबों की, या कोई बात कही थी उसने...
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अलविदा का लफ्ज़ था या रुकने का इशारा...
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4) दिनरात कोशिश में रहता हूँ के कुछ कमा सकूँ,
बाकी सारा क़र्ज़ भी जल्दी ही चुका सकूँ...
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कुछ किश्तें अभी बाकी है ज़िन्दगी के उधार की..
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5) कहने को तो महज़ एक पल ही था वो,
और अचानक मै कई साल बड़ा हो गया.
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तुम्हारा जाना मुझे उम्रदराज़ कर गया.......
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