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संदीप "अलबेला "

 

 

हम डूबे रहे गुलाल और पकवान की मस्ती में
और चौक पर कोई निवाले को तरसता रहा

 

 

रंगो की डोली आयी तुम न आये
गुलाल संग ठिठोली आयी तुम न आये
मन मोरा असुवन मे डूबा और तन कोरा रहा
खुशियो की होली आयी तुम न आये

 

 

 

गलियाँ सूनी आँगन सूना
सूना घर संसार।
मेरे रोम-रोम में साजन
बसा है तेरा प्यार।

 

 

 

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